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১৭ আশ্বিন ১৪৩৩
রবিবার · ৪ অক্টোবর ২০২৬
আনুপূর্বী বাংলা
✦ অতীত ও অনাগত-এর সন্ধিক্ষণে ✦
আসন্ন অনুষ্ঠান 11 Oct 2026
Exploring The Dharma of Justice in the Sanskrit Epics
Prof Ruth Vanita
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विकास पाण्डेय की दो कविताएँ

इन दोनों कविताओं में जीवन, प्रतीक्षा, आत्मसंघर्ष और चेतना की जटिल यात्रा उभरती है। पहली कविता अनन्त प्रतीक्षा और अस्तित्व की क्षीणता को नदी, बर्फ और दीप के बिम्बों में देखती है; दूसरी आत्ममंथन, मलिनताओं, क्षुद्रताओं और साधना के बीच मनुष्य के भीतर घटते आध्यात्मिक द्वंद्व को स्वर देती है।
विकास पाण्डेय की दो कविताएँ
AIयह चित्र प्रतीकात्मक है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की सहायता से निर्मित है

কবিতা গুচ্ছ সূচি (২টি কবিতার সংকলন)

কবিতা ১

चिर-प्रतीक्षा

सृष्टि की देहली पर जलते
दीप-सी,
इस अनन्त प्रतीक्षा में-
जीवन का हिस्सा 
हमेशा कमतर ही रहा है!
धरती न जाने कितने शिशिर से
आकाश को थाम्हें,
बर्फीले पर्तों में अन्तर्वाष्पित 
पथरीले अनुभवों की चट्टानों में
भटकती,-
शतधा-घूर्णित ऊर्मिल नदी बन चुकी है।
टूटता हुआ पत्र संभवन में 
अपनी प्रतीक्षा से उऋण,
जब-
विरत हो रहा होता है
प्रातीतिक अस्तित्व से;
अपने अभिमंत्रित कीलकों को भेद कर 
लहराने लगते हैं शब्द
हवाओं में,
प्रतीक्षाएं अनन्त ही होती हैं,
होती रहीं है,
जीवन का हिस्सा हमेशा कमतर ही रहा है
संसार चिर-प्रतीक्षित है।
❦   ~   ❦   ~   ❦
কবিতা ২

विदग्ध-जीवन

ताप-
जीवन के जो कुछ,
सब तुम्हारा है अनुग्रह।
जमापूंजी-
अमिट अपनी,
हृदय की सब मलिनताएं।
भाव-
जो कुछ है हमारे,
रागरञ्जित अरिक्त संकुल।
अस्ति का-
यह भाव विस्तृत,
कीलित देह-सीप में ।
काल-
कुंए के किनारे,
सब सीढ़ियां टूटी हुईं हैं।
आत्म-
का संकोच-सौरभ,
उड़ रहा है सघन बनकर।
क्षुद्रताओं-
का अंधेरा,
दीप होकर जगमगाता।
मैं-
भटकती भीड़-सा,
पथ पर विकल सम्मोहनों के।
साधनाएं -
वर्तुल दिशा-सी,
खो रहीं अपना किनारा।
घुर्घुराता-
मौन भीषण,
चेतना संत्रस्त है।
Vikas Pandey V
লেখক পরিচিতি
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Vikas Pandey

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

संप्रति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी के दर्शन एवं धर्म विभाग मेंं शोधार्थी ।

স্বত্ব ও লাইসেন্স: এই রচনাটি CC BY-NC-ND 4.0 লাইসেন্সের আওতায় প্রকাশিত। মূল লেখকের নাম ও ‘আনুপূর্বী’ পত্রিকার সূত্র উল্লেখ সাপেক্ষে অবাণিজ্যিক ব্যবহারের জন্য উন্মুক্ত।
গুরুত্বপূর্ণ ঘোষণা: এখানে প্রকাশিত লেখক, অতিথি ও অন্যান্য অংশগ্রহণকারীদের বক্তব্য ও মতামত একান্তই তাঁদের নিজস্ব; তা Poorvam-এর নীতি বা অবস্থান প্রতিফলিত করে না।

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