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Mahābhārata • Parva 12 (Śāntiparva) • Adhyāya 325

Śāntiparva Adhyāya 325

शान्तिपर्व • अध्यायः 325

Śāntiparva Adhyāya 325 of the classical Mahābhārata with 5 verses.

Total: 5 Verses • Citations: MBh 12.325.1–5 • 250 Lexicon Terms
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं नारदो भगवानृषिः । ददर्श तानेव नराञ्श्वेतांश्चन्द्रप्रभाञ्शुभान् ॥
English Translation
Bhishma said "Arrived at the spacious kingdom called White Island, the illustrious Rishi saw those same white men effulgent like the sun.
पूजयामास शिरसा मनसा तैश्च पूजितः । दिदृक्षुर्जप्यपरमः सर्वकृच्छ्रधरः स्थितः ॥
English Translation
Adored by them, the Rishi worshipped them in return by bending his head and respecting them in his mind. Desirous of seeing Narayana, he began to live there, attentively engaged in the silent recitation of Mantras sacred to him, and practising the most difficult VOWS.
भूत्वैकाग्रमना विप्र ऊर्ध्वबाहुर्महामुनिः । स्तोत्रं जगौ स विश्वाय निर्गुणाय महात्मने ॥
English Translation
With rapt mind, the twice-born Rishi, with arms upraised, stood in Yoga, and then sang the following hymn to the Lord of the universe, Him, viz., who is at once the soul of attributes and divested of ali attributes.
नमस्ते देवदेव [1] निष्क्रिय [2] निर्गुण [3] लोकसाक्षिन् [4] क्षेत्रज्ञ [5] अनन्त [6=116] पुरुष [7] महापुरुष [8] त्रिगुण [9] प्रधान [10] । अमृत [11] व्योम [12] सनातन [13] सदसद्व्यक्ताव्यक्त [14] ऋतधामन् [15] पूर्वादिदेव [16] वसुप्रद [17] प्रजापते [18] सुप्रजापते [19] वनस्पते [20] । महाप्रजापते [21] ऊर्जस्पते [22] वाचस्पते [23] मनस्पते [24] जगत्पते [25] दिवस्पते [26] मरुत्पते [27] सलिलपते [28] पृथिवीपते [29] दिक्पते [30] । पूर्वनिवास [31] ब्रह्मपुरोहित [32] ब्रह्मकायिक [33] महाकायिक [34] महाराजिक [35] चतुर्महाराजिक [36] आभासुर [37] महाभासुर [38] सप्तमहाभासुर [39] याम्य [40] । महायाम्य [41] संज्ञासंज्ञ [42] तुषित [43] महातुषित [44] प्रतर्दन [45] परिनिर्मित [46] वशवर्तिन् [47] अपरिनिर्मित [48] यज्ञ [49] महायज्ञ [50] । यज्ञसंभव [51] यज्ञयोने [52] यज्ञगर्भ [53] यज्ञहृदय [54] यज्ञस्तुत [55] यज्ञभागहर [56] पञ्चयज्ञधर [57] पञ्चकालकर्तृगते [58] पञ्चरात्रिक [59] वैकुण्ठ [60] । अपराजित [61] मानसिक [62] परमस्वामिन् [63] सुस्नात [64] हंस [65] परमहंस [66] परमयाज्ञिक [67] सांख्ययोग [68] अमृतेशय [69] हिरण्येशय [70] । वेदेशय [71] कुशेशय [72] ब्रह्मेशय [73] पद्मेशय [74] विश्वेश्वर [75] त्वं जगदन्वयः [76] त्वं जगत्प्रकृतिः [77] तवाग्निरास्यम् [78] वडवामुखोऽग्निः [79] त्वमाहुतिः [80] । त्वं सारथिः [81] त्वं वषट्कारः [82] त्वमोंकारः [83] त्वं मनः [84] त्वं चन्द्रमाः [85] त्वं चक्षुराद्यम् [86] त्वं सूर्यः [87] त्वं दिशां गजः [88] दिग्भानो [89] हयशिरः [90] । प्रथमत्रिसौपर्ण [91] पञ्चाग्ने [92] त्रिणाचिकेत [93] षडङ्गविधान [94] प्राग्ज्योतिष [95] ज्येष्ठसामग [96] सामिकव्रतधर [97] अथर्वशिरः [98] पञ्चमहाकल्प [99] फेनपाचार्य [100] । वालखिल्य [101] वैखानस [102] अभग्नयोग [103] अभग्नपरिसंख्यान [104] युगादे [105] युगमध्य [106] युगनिधन [107] आखण्डल [108] प्राचीनगर्भ [109] कौशिक [110] । पुरुष्टुत [111] पुरुहूत [112] विश्वरूप [113] अनन्तगते [114] अनन्तभोग [115] अनन्त [116=6] अनादे [117] अमध्य [118] अव्यक्तमध्य [119] अव्यक्तनिधन [120] । व्रतावास [121] समुद्राधिवास [122] यशोवास [123] तपोवास [124] लक्ष्म्यावास [125] विद्यावास [126] कीर्त्यावास [127] श्रीवास [128] सर्वावास [129] वासुदेव [130] । सर्वच्छन्दक [131] हरिहय [132] हरिमेध [133] महायज्ञभागहर [134] वरप्रद [135=157] यमनियममहानियमकृच्छ्रातिकृच्छ्रमहाकृच्छ्रसर्वकृच्छ्रनियमधर [136] निवृत्तधर्मप्रवचनगते [137] प्रवृत्तवेदक्रिय [138] अज [139] सर्वगते [140] । सर्वदर्शिन् [141] अग्राह्य [142] अचल [143] महाविभूते [144] माहात्म्यशरीर [145] पवित्र [146] महापवित्र [147] हिरण्मय [148] बृहत् [149] अप्रतर्क्य [150] । अविज्ञेय [151] ब्रह्माग्र्य [152] प्रजासर्गकर [153] प्रजानिधनकर [154] महामायाधर [155] चित्रशिखण्डिन् [156] वरप्रद [157=135] पुरोडाशभागहर [158] गताध्वन् [159] छिन्नतृष्ण [160] । छिन्नसंशय [161] सर्वतोनिवृत्त [162] ब्राह्मणरूप [163] ब्राह्मणप्रिय [164] विश्वमूर्ते [165] महामूर्ते [166] बान्धव [167] भक्तवत्सल [168] ब्रह्मण्यदेव [169] भक्तोऽहं त्वां दिदृक्षुः [170] एकान्तदर्शनाय नमो नमः [171] ॥
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