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विक्रम संवत २०८३
बुधवार · २८ अक्टूबर २०२६
आनुपूर्वी हिन्दी
✦ अतीत और अनागत के संधिकाल में ✦
आगामी कार्यक्रम 31 Oct 2026
Exploring the Place of Devotion: Siting and Experiencing Divinity in Bengal-Vaishnavism
Sukanya Sarbadhikary
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हो जाता जीवन धन्य-धन्य

इस कविता का मुख्य भाव संकट के समय मिलने वाली राहत, संतोष और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण है। कवि यह दर्शाना चाहते हैं कि जब मनुष्य जीवन के संघर्षों, दुखों, अभावों और विकृतियों से घिरकर पूरी तरह हताश हो जाता है, तब जीवन में मिलने वाली थोड़ी सी भी राहत (चाहे वह सुख का समंदर हो, वर्षा हो, सच्चे संबंध हों या अंतरात्मा की पुकार हो) जीवन को कृतज्ञता और धन्य-धन्य भाव से भर देती है। यह कविता प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आशा की किरण तलाशने की प्रेरणा देती है।
हो जाता जीवन धन्य-धन्य
AIयह चित्र प्रतीकात्मक है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की सहायता से निर्मित है
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कविता

हो जाता जीवन धन्य-धन्य

नित नई जीवन संघर्षों से,
जब टूटने लगा हो अंतर्मन।
तब सुख के मिले समंदर से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।1।।
जब फसल सुख रहा हो जलबिन,
अभिशप्त तप्त मरु वातावरण में।
फिर बरसने वाली अमृत वर्षा से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।2।।
संबंध नए-पुराने हों कोई भी,
गर दुःख में रहे हमेशा साथ।
सुख आने पर उन संबंधों से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।3।।
छोटी-छोटी खुशियों के पल,
जब बिखरे हों इधर-उधर।
समेटकर उन्हें जी लेने से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।4।।
जब मन की इच्छा-पूर्ति में,
हो जाए विकृत निंदित मन।
फिर अंतर्मन के उपदेशों से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।5।।
जब काया रोगों का घर हो,
सुख-साधन हीन गरल हो।
फिर अमृत औषध पान से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।6।।
इंडस यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद तिथि – 02/09/2024
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लेखक परिचय
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डॉ. प्रकाश कुमार पोद्दार

डॉ. प्रकाश कुमार पोद्दार (मूल निवासी: कटिहार, बिहार) गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय से राजभाषा हिंदी में पीएचडी (2022) और दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक (2004) एवं स्नातकोत्तर (2014) की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात, वर्तमान में इंडस यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंडिक स्टडीज में सहायक प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अकादमिक जगत में उनकी सक्रिय सहभागिता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वे यूजीसी की लर्निंग आउट्कम-बेस्ड करिकुलम फ्रेमवर्क (LOCF, Hindi) समिति 2025-2026 में भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) के विशेषज्ञ के रूप में शामिल रहे हैं। इसके साथ ही, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके कई आलेख व शोधालेख प्रकाशित हो चुके हैं और एकेडमी पब्लिशिंग नेटवर्क द्वारा उनका काव्य संग्रह 'गरिमामय शब्दातीत पूनो' भी प्रकाशित हुआ है।

स्वत्व एवं लाइसेंस: यह रचना CC BY-NC-ND 4.0 लाइसेंस के अंतर्गत प्रकाशित है। मूल लेखक का नाम और ‘आनुपूर्वी’ पत्रिका के संदर्भ के उल्लेख के साथ गैर-व्यावसायिक उपयोग के लिए मुक्त है।
महत्वपूर्ण घोषणा: यहाँ प्रकाशित लेखकों, अतिथियों और अन्य प्रतिभागियों के विचार एवं मत सर्वथा उनके अपने हैं; वे Poorvam की नीति या दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित नहीं करते।