हो जाता जीवन धन्य-धन्य
जब टूटने लगा हो अंतर्मन।
तब सुख के मिले समंदर से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।1।।
अभिशप्त तप्त मरु वातावरण में।
फिर बरसने वाली अमृत वर्षा से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।2।।
गर दुःख में रहे हमेशा साथ।
सुख आने पर उन संबंधों से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।3।।
जब बिखरे हों इधर-उधर।
समेटकर उन्हें जी लेने से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।4।।
हो जाए विकृत निंदित मन।
फिर अंतर्मन के उपदेशों से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।5।।
सुख-साधन हीन गरल हो।
फिर अमृत औषध पान से,
हो जाता जीवन धन्य-धन्य ।।6।।