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Full Chapter
RV • Chapter 13: Canto 13

RV 13.2

Canonical Ref: RV 13.2
Metrical Form: इन्द्रवज्रा
Sanskrit (Devanāgarī)
वैदेहि! पश्याऽऽमलयाद्विभक्तं मत्सेतुना फेनिलमम्बुराशिम् । छायापथेनेव शरत्प्रसन्नमाकाशमाविष्कृतचारुतारम् ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): वैदेहीति॥ हे वैदेहि सीते! आ मलयान्मलयपर्यन्तम्। `पञ्चम्यपाङ्परिभिः` (पा.2।3।10) इति पञ्चमी। पदद्वयं चैतत्। मत्सेतुना विभक्तं द्विधा कृतम्। अत्यायतसेतुनेत्यर्थः। हर्षाधिक्याञ्च मद्ग्रहणम्। फेनिलं फेनवन्तम्। `फेनादिलञअच` (पा.5।2।99)इतीलच्प्रत्ययः। क्षिप्रकारी चायमिति भावः। अम्बुराशिम्। छायापथेन विभक्तं शरत्प्रसन्नमाविष्कृतचारुतारमाकाशमिव। पश्य। मम महानयं प्रयासस्त्वदर्थं इति हृदयम्। छायापथो नाम ज्योतिश्चक्रमध्यवर्ती कश्चित्तिरश्चीनोऽवकाशः ॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 13.2. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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