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विक्रमसंवत् २०८३
शुक्रवासरः · ३० अक्तूबर २०२६
आनुपूर्वी संस्कृतम्
✦ अतीतानागतयोः सन्धौ ✦
आगामी कार्यक्रमः 31 Oct 2026
Exploring the Place of Devotion: Siting and Experiencing Divinity in Bengal-Vaishnavism
Sukanya Sarbadhikary
पाण्डुलिपिः प्रेष्यताम्

विकास पाण्डेय की दो कविताएँ

इन दोनों कविताओं में जीवन, प्रतीक्षा, आत्मसंघर्ष और चेतना की जटिल यात्रा उभरती है। पहली कविता अनन्त प्रतीक्षा और अस्तित्व की क्षीणता को नदी, बर्फ और दीप के बिम्बों में देखती है; दूसरी आत्ममंथन, मलिनताओं, क्षुद्रताओं और साधना के बीच मनुष्य के भीतर घटते आध्यात्मिक द्वंद्व को स्वर देती है।
विकास पाण्डेय की दो कविताएँ
AIयह चित्र प्रतीकात्मक है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की सहायता से निर्मित है
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कविता-सङ्ग्रह-सूची (२ कवितानां सङ्कलनम्)

कविता १

चिर-प्रतीक्षा

सृष्टि की देहली पर जलते
दीप-सी,
इस अनन्त प्रतीक्षा में-
जीवन का हिस्सा 
हमेशा कमतर ही रहा है!
धरती न जाने कितने शिशिर से
आकाश को थाम्हें,
बर्फीले पर्तों में अन्तर्वाष्पित 
पथरीले अनुभवों की चट्टानों में
भटकती,-
शतधा-घूर्णित ऊर्मिल नदी बन चुकी है।
टूटता हुआ पत्र संभवन में 
अपनी प्रतीक्षा से उऋण,
जब-
विरत हो रहा होता है
प्रातीतिक अस्तित्व से;
अपने अभिमंत्रित कीलकों को भेद कर 
लहराने लगते हैं शब्द
हवाओं में,
प्रतीक्षाएं अनन्त ही होती हैं,
होती रहीं है,
जीवन का हिस्सा हमेशा कमतर ही रहा है
संसार चिर-प्रतीक्षित है।
❦   ~   ❦   ~   ❦
कविता २

विदग्ध-जीवन

ताप-
जीवन के जो कुछ,
सब तुम्हारा है अनुग्रह।
जमापूंजी-
अमिट अपनी,
हृदय की सब मलिनताएं।
भाव-
जो कुछ है हमारे,
रागरञ्जित अरिक्त संकुल।
अस्ति का-
यह भाव विस्तृत,
कीलित देह-सीप में ।
काल-
कुंए के किनारे,
सब सीढ़ियां टूटी हुईं हैं।
आत्म-
का संकोच-सौरभ,
उड़ रहा है सघन बनकर।
क्षुद्रताओं-
का अंधेरा,
दीप होकर जगमगाता।
मैं-
भटकती भीड़-सा,
पथ पर विकल सम्मोहनों के।
साधनाएं -
वर्तुल दिशा-सी,
खो रहीं अपना किनारा।
घुर्घुराता-
मौन भीषण,
चेतना संत्रस्त है।
Vikas Pandey V
लेखक-परिचयः
परिचयः →

Vikas Pandey

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

संप्रति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी के दर्शन एवं धर्म विभाग मेंं शोधार्थी ।

सर्वाधिकारः अनुमतिश्च: इयं रचना CC BY-NC-ND 4.0 अनुमत्या प्रकाशिता अस्ति। मूललेखकस्य नाम्नः ‘आनुपूर्वी’-पत्रिकायाः च उल्लेखेन सह अवाणिज्यिक-उपयोगाय मुक्ता वर्तते।
महत्त्वपूर्णा उद्घोषणा: अत्र प्रकाशितानि लेखकानाम्, अतिथीनां च मतानि तेषाम् एव सन्ति; तानि Poorvam-संस्थायाः नीतयः न प्रतिविम्बयन्ति।