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Ch. 2 RV 2.63
Full Chapter
RV • Chapter 2: Canto 2

RV 2.63

Canonical Ref: RV 2.63
Metrical Form: उपजातिः
Sanskrit (Devanāgarī)
भक्त्या गुरौ मय्यनुकम्पया च प्रीतास्मि ते पुत्र! वरं वृणीष्व । न केवलानां पयसां प्रसूतिमवेहि मां कामदुघां प्रसन्नाम् ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): भक्त्येति॥ हे पुत्र! गुरौ। भक्त्या। मय्यनुकम्पया च। ते तुभ्यं प्रीताऽस्मि। `क्रियाग्रहणमपि कर्तव्यम्` इति चतुर्थी। वरं देवेभ्यो वरणीयमर्थम्। `देवाद्धृते वरः श्रेष्ठे त्रिषु क्लीबं मनाक्प्रिये` इत्यमरः। वृणीष्व स्वीकुरु। तथा हि-मां केवलानां पयसां प्रसूतिं कारणं नावेहि न विद्धिः। किंतु प्रसन्नां माम्। कामान्दोग्धीति कामदुघा। तामवेहि। `दुहः कब्थश्च` (पा.3।2।70) इति कप्प्रत्ययः ॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 2.63. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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