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Ch. 17 RV 17.71
Full Chapter
RV • Chapter 17: Canto 17

RV 17.71

Canonical Ref: RV 17.71
Metrical Form: अनुष्टुप्
Sanskrit (Devanāgarī)
प्रवृद्धौ हीयते चन्द्रः समुद्रोऽपि तथाविधः । स तु तत्समवृद्धिश्च न चाभूत्ताविव क्षयी ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): प्रवृद्धाविति॥ प्रवृद्धौ सत्यां चन्द्रो हीयते। समुद्रोऽपि तथाविधश्चन्द्रवदेव प्रवृद्धौ हीयते। `प्रवृद्ध` इति वा पाठः। स राजा तु ताभ्यां चन्द्र-समुद्राभ्यां समा वृद्धिर्यस्य स तत्समवृद्धिश्चाभूत्। तौ चन्द्रसमुद्राविव क्षयी। `जिदृक्षि-` (पा.3।2।157) इत्यादिनेनिप्रत्ययः। नाभूत् ॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 17.71. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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