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Ch. 1 RV 1.26
Full Chapter
RV • Chapter 1: Canto 1

RV 1.26

Canonical Ref: RV 1.26
Metrical Form: अनुष्टुप्
Sanskrit (Devanāgarī)
दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् । संपद्विनिमयेनोभौ दधतुर्भुवनद्वयम् ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): दुदोहेति॥ स राजा यज्ञाय यज्ञं कर्तुं गां भुवं दुदोह। करग्रहणेन रिक्तां चकारेत्यर्थः। मघवा देवेन्द्रः सस्याय सस्यं वर्धयितुं दिवं स्वर्गं दुदोह। द्युलोकान्महीलोके वृष्टिमुत्पादयामासेत्यर्थः। `क्रियार्थोपपदस्य-` (पा. 2।3।14) इत्यादेना यज्ञसस्याभ्यां चतुर्थीं। एवमुभौ संपदो विनिमयेन परस्परमादानप्रतिदानाभ्यां भुवनद्वयं दधतुः पुपुषतुः। राजा यज्ञैरिन्द्रलोकमिन्द्रश्चोदकेन भूलोकं पुपोषेत्यर्थः। उक्तं च दण्डनीतौ-`राजा त्वर्थान्समाहृत्य कुर्यादिन्द्रमहोत्सवम्। प्रीणितो मेघवाहस्तु महतीं वृष्टिमावहेत् ॥` इति ॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 1.26. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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