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Ch. 8 RV 8.32
Full Chapter
RV • Chapter 8: Canto 8

RV 8.32

Canonical Ref: RV 8.32
Metrical Form: वियोगिनी
Sanskrit (Devanāgarī)
स कदाचिदवेक्षितप्रजः सह देव्या विजहार सुप्रजाः । नगरोपवने शचीसखो मरुतां पालयितेव नन्दने ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): स इति॥ अवेक्षितप्रजोऽकुतोभयत्वेनानुसंहितप्रजः। `नित्यमसिच्प्रजामेधयोः` (पा.5।4।122) इत्यसिच्प्रत्ययः। न केवलं स्त्रैण इति भावः। शोभना प्रजा यस्यासा सुप्रजाः सुपुत्रवान्। पुत्रन्यस्तभार इति भावः। सोऽजः कदाचिद्देव्या महिष्येन्दुमत्या सह नगरोपवने। नन्दने नन्दनाख्येऽमरावत्युपकण्ठवने शचीसखः। शच्या सहेत्यर्थः। मरुतां देवानां पालयितेन्द्र इव। विजहार चिक्रीड॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 8.32. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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