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Ch. 8 RV 8.22
Full Chapter
RV • Chapter 8: Canto 8

RV 8.22

Canonical Ref: RV 8.22
Metrical Form: वियोगिनी
Sanskrit (Devanāgarī)
न नवः प्रभुरा फळलोदयात्स्थिरकर्मा विरराम कर्मणः । न च योगविधेर्नवेतरः स्थिरधीरा परमात्मदर्शनात् ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): नेति॥ स्थिरकर्मा फलोदयकर्मकारी नवः प्रभुरज आ फलोदयात् फलसिद्धिपर्यन्तं कर्मण आरम्भान्न विरराम न निवृत्तः। जुगुप्साविरामप्रमादार्थानामुपसंख्यानम्`(वा.1079) इत्यपादानात्पञ्चमी। `व्याङ्परिभ्यो रमः` (पा.1।3।83)इति परस्मैपदम्। स्थिरधीर्निश्चलचित्तो नवेतरो रघुश्चापरमात्मदर्शनात् परमात्मसाक्षात्कारपर्यन्तं योगविधेरैक्यानुसंधानान्न विरराम ॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 8.22. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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