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Ch. 18 RV 18.28
Full Chapter
RV • Chapter 18: Canto 18

RV 18.28

Canonical Ref: RV 18.28
Metrical Form: उपजातिः
Sanskrit (Devanāgarī)
यशोभिराब्रह्मसभं प्रकाशः स ब्रह्मभूयं गतिमाजगाम । ब्रह्मिष्ठमाधाय निजेऽधिकारे ब्रह्मिष्ठमेव स्वतनुप्रसूतम् ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): यशोभिरिति॥ आ ब्रह्मसभाया आब्रह्मसभं ब्रह्मसदनपर्यन्तम्। अभिविधावव्ययीभावः। यशोभिः। प्रकाशः प्रसिद्धः, स कौसल्योऽतिशयेन ब्रह्मवन्तं ब्रह्मिष्ठम्। ब्रह्मविदमित्यर्थः। `ब्रह्म`शब्दान्मतुबन्तादिष्ठन्प्रत्यये `विन्मतोर्लुक्` (पा.5।3।65) इति मतुपो लुक्। `नस्तद्धिते` (पा.6।4।144) इति टिलोपः। ब्रह्मिष्ठं ब्रह्मिष्ठाख्यं स्वतनुप्रसूतं स्वात्मजमेव निजे स्वकीयेऽधिकारे प्रजापालनकृत्ये। आधाय निधाय। ब्रह्मणो भावो ब्रह्मभूयं ब्रह्मत्वं तदेव गतिस्तामाजगाम। मुक्तोऽभूदित्यर्थः। `स्याद्द्ब्रह्मभूयं ब्रह्मत्वम्` इत्यमरः। भुवो भावे क्यप् ॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 18.28. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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