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Ch. 18 RV 18.24
Full Chapter
RV • Chapter 18: Canto 18

RV 18.24

Canonical Ref: RV 18.24
Sanskrit (Devanāgarī)
आराध्य विश्वेश्वरमीश्वरेण तेन क्षितेर्विश्वसहो विजज्ञे । पातुं सहो विशअवसखः समग्रां विशअवंभरामात्मजमूर्तिरात्मा ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): आराध्येति॥ तेन क्षितेरीश्वरेण व्यषिताश्वेन विश्वेश्वरं काशीपतिमाराध्योपास्य विश्वसहो नाम विश्वसखः समग्रां सर्वां विश्वंभरां भुवं पातुं रक्षितुं सहत इति सहः क्षमः। पचाद्यच्। आत्मजमूर्तिः पुत्ररूप्यात्मा स्वयमेव। `आत्मा वै पुत्रनामासि`(आश्व.सू.1।15) इति श्रुतेः। विजज्ञे सुषुवे। विपूर्वो जनिर्गर्भविमोचने वर्तते। यथाह भगवान्पाणिनिः-`समां समां विजायते` इति ॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 18.24. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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