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Ch. 10 RV 10.37
Full Chapter
RV • Chapter 10: Canto 10

RV 10.37

Canonical Ref: RV 10.37
Metrical Form: अनुष्टुप्
Sanskrit (Devanāgarī)
बभौ सदशनज्योत्स्ना सा विभोर्वदनोद्गता । निर्यातशेषा चरणाद्गङ्गेवोर्ध्वप्रवर्तिनी ॥
व्याख्या / Traditional Commentary & Notes Classical Exegesis
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः): बभाविति॥ विभोर्विष्णोर्वदनादुद्गता निःसृता। सदशनज्योत्स्ना दन्तकान्तिसहिता। इदं च विशेषणं धावल्यातिशयार्थम्। अत एव सा भारती। चरणादङ्घ्रेर्निर्याता चासौ शेषा च निर्यातशेषा। निःसृतावशिष्टेत्यर्थः। `स्रियाः पुंवत्-` (पा.6।3।34)इत्यनुवर्त्य `पुंवत्कर्मधारय-` (पा.6।3।42)इति पुंवद्भावः। `निर्यात`शब्दस्य या निर्याता सावशेषा सा गङ्गेवेति सामानाधिकरण्यनिर्वाहः। निर्यातायाः शेषेति विग्रहे पुंवद्भावो दुर्घटा एव। ऊर्ध्वप्रवर्तिन्यूर्ध्ववाहिनी गङ्गेव। बभौ। इत्युत्प्रेक्षा ॥
Canonical CTS URN Reference
Raghuvaṁśam, RV 10.37. Poorvam Open Research Engine (PORE) Corpus.
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