विकास पाण्डेय की दो कविताएँ
दीप-सी,
इस अनन्त प्रतीक्षा में-
जीवन का हिस्सा
हमेशा कमतर ही रहा है!
धरती न जाने कितने शिशिर से
आकाश को थाम्हें,
बर्फीले पर्तों में अन्तर्वाष्पित
पथरीले अनुभवों की चट्टानों में
भटकती,-
शतधा-घूर्णित ऊर्मिल नदी बन चुकी है।
टूटता हुआ पत्र संभवन में
अपनी प्रतीक्षा से उऋण,
जब-
विरत हो रहा होता है
प्रातीतिक अस्तित्व से;
अपने अभिमंत्रित कीलकों को भेद कर
लहराने लगते हैं शब्द
हवाओं में,
प्रतीक्षाएं अनन्त ही होती हैं,
होती रहीं है,
जीवन का हिस्सा हमेशा कमतर ही रहा है
संसार चिर-प्रतीक्षित है।
जीवन के जो कुछ,
सब तुम्हारा है अनुग्रह।
अमिट अपनी,
हृदय की सब मलिनताएं।
जो कुछ है हमारे,
रागरञ्जित अरिक्त संकुल।
यह भाव विस्तृत,
कीलित देह-सीप में ।
कुंए के किनारे,
सब सीढ़ियां टूटी हुईं हैं।
का संकोच-सौरभ,
उड़ रहा है सघन बनकर।
का अंधेरा,
दीप होकर जगमगाता।
भटकती भीड़-सा,
पथ पर विकल सम्मोहनों के।
वर्तुल दिशा-सी,
खो रहीं अपना किनारा।
मौन भीषण,
चेतना संत्रस्त है।