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Literature · 4 Oct 2026 · हिन्दी · Anupurvi

विकास पाण्डेय की दो कविताएँ

विकास पाण्डेय की दो कविताएँ
इन दोनों कविताओं में जीवन, प्रतीक्षा, आत्मसंघर्ष और चेतना की जटिल यात्रा उभरती है। पहली कविता अनन्त प्रतीक्षा और अस्तित्व की क्षीणता को नदी, बर्फ और दीप के बिम्बों में देखती है; दूसरी आत्ममंथन, मलिनताओं, क्षुद्रताओं और साधना के बीच मनुष्य क...
चिर-प्रतीक्षा
सृष्टि की देहली पर जलते
दीप-सी,
इस अनन्त प्रतीक्षा में-
जीवन का हिस्सा 
हमेशा कमतर ही रहा है!
धरती न जाने कितने शिशिर से
आकाश को थाम्हें,
बर्फीले पर्तों में अन्तर्वाष्पित 
पथरीले अनुभवों की चट्टानों में
भटकती,-
शतधा-घूर्णित ऊर्मिल नदी बन चुकी है।
टूटता हुआ पत्र संभवन में 
अपनी प्रतीक्षा से उऋण,
जब-
विरत हो रहा होता है
प्रातीतिक अस्तित्व से;
अपने अभिमंत्रित कीलकों को भेद कर 
लहराने लगते हैं शब्द
हवाओं में,
प्रतीक्षाएं अनन्त ही होती हैं,
होती रहीं है,
जीवन का हिस्सा हमेशा कमतर ही रहा है
संसार चिर-प्रतीक्षित है।
िवदग्ध-जीवन
ताप-
जीवन के जो कुछ,
सब तुम्हारा है अनुग्रह।
जमापूंजी-
अमिट अपनी,
हृदय की सब मलिनताएं।
भाव-
जो कुछ है हमारे,
रागरञ्जित अरिक्त संकुल।
अस्ति का-
यह भाव विस्तृत,
कीलित देह-सीप में ।
काल-
कुंए के किनारे,
सब सीढ़ियां टूटी हुईं हैं।
आत्म-
का संकोच-सौरभ,
उड़ रहा है सघन बनकर।
क्षुद्रताओं-
का अंधेरा,
दीप होकर जगमगाता।
मैं-
भटकती भीड़-सा,
पथ पर विकल सम्मोहनों के।
साधनाएं -
वर्तुल दिशा-सी,
खो रहीं अपना किनारा।
घुर्घुराता-
मौन भीषण,
चेतना संत्रस्त है।
Discipline / Topic हिन्दी

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